117 चांद की रातें और एक तेरा चेहरा

 117 चांद की रातें और एक तेरा चेहरा!

मैंने इतना कहा और वो मुस्कुराई,
मानो, बर्फ के किसी घन पर धूप पड़ी हो!
रंज चेहरे को मुस्कुराता देख मैं मुतमइन होता
तभी उसने पूछ लिया.
चांद की 117 रातें ही क्यों?
एक आशिक़ को इसी बेचैनी की तलाश होती है!
उत्तरों में दिलचस्पी और
सवालों के अधूरेपन से इश्क़ जिंदा रहता है!
आज एक बरस बाद उसने फिर पूछा!
चांद की 117 रातें ही क्यों?
...आदर्श

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