George Orwell - 1984
George Orwell - 1984
बिहार के मोतिहारी में जन्मे जॉर्ज ऑरवेल ने 1940 के दशक में एक किताब लिखी थी, जिसका नाम है "1984". अंग्रेजी में लिखे गए इस किताब की वैसे तो बहुत से भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. और अब यह किताब हिंदी में भी उपलब्ध है.
इस दौर में यह किताब पढ़नी इसलिए भी जरूरी है ताकि युद्ध, नफरत और हिंसा के पीछे के राजनैतिक व्यापार (Political Trade) को समझा जा सके.
प्रेम संबंधों को लेकर जूलिया के परिचय को विंस्टन ने जिस रूप में स्वीकार किया है. वह आज की युवा पीढ़ी को विरोध के सच्चे परिभाषा की तस्वीर दिखाती है.
हमेशा युद्ध का माहौल बना रहे, जिससे लोगों में असुरक्षा का भाव बना रहे. जिससे एक छोटा सा समूह सत्ता में बना रह सके. लोगों में इतनी नफरत भरो कि लोग एक दूसरे से बात करने के बजाय एक-दूसरे पर हमला करें. सरहदों को ऐसे तैयार करो कि पड़ोसी मुल्कों से केवल "मिसाइल" को आने-जाने की इजाज़त हो. क्योंकि लोग यदि आपस में बात कर लेंगे तो मोहब्बत कर लेंगे.
साहेब हीं भगवान है सो कुर्सी की आलोचना पाप है. जरूरी है हर सुबह 11:00 बजे एक अनदेखे दुश्मन को लानत भेजी जाए. समय-समय पर निरंतर रूप से नफरत का महोत्सव हो. और लोग अपने चेहरे के ऊपर स्पष्ट रूप से लिख लें.
युद्ध शांति है, स्वतंत्रता गुलामी है, अज्ञानता शक्ति है.
क्योंकि.... Big Brother is Watching You.
ऐसे में मैं तो यही कहूंगा......
"जॉर्ज ऑरवेल की 1984 को हाथ में लेकर हर इंसान एक दूसरे से बस वही बात कहें, जो जूलिया ने विंस्टन से अपने पहले ख़त में कहा था".
...आदर्श

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