जिंदाबाद जावेद साहेब!

 जॉर्ज ऑरवेल 1984 में कहते हैं कि - दो पड़ोसी मुल्कों के लोगों में इतनी नफ़रत भर दो कि उनके बीच केवल "मिसाइल" आने-जाने की इजाज़त हो.

पीड़ा को पीड़ा पूर्वक कहने पर पत्थर को भी सुनाई देता है.
कहन में आँसू से भी गहरी अवस्था का नाम है "शायरी"!
तल्ख़ हालातों के बावजूद भी एक शायर लाहौर जाकर अपने ख़म को कह देता है, और लोग उसे Warm Greetings के साथ स्वीकार करते हैं. यह तमीज़ सिर्फ साहित्य को हासिल है, सियासत को नहीं.
जिंदाबाद जावेद साहेब! javed saab @faiz_fastiva_lahor_2023

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